शहीद ए आजम ( भगत सिंह) कहाँ से मिली शहादत की तालीम

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शहीद ए आजम  भगत सिंह

स्वयं अमर होकर दूसरों की सोई आत्मा को जीवित करने वाले , आजादी के हीरो भगर सिंह का जन्म आज के दिन सन 1907 में हुआ था । भगत सिंह को जब फाँसी हुई तो वो महज 23 साल के थे । हर माँ की तरह उनकी माँ का भी सपना था कि वह भगत की शादी देखे । उनकी एक बहु आये । जब उनकी माँ ने भगत सिंह से कहा कि वो शादी कर ले तो उन्होंने कहा कि “मेरी मौत ही मेरी दुल्हन होगी और शहादत ही शादी” ।

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भगत के जीवन का लक्ष्य ही शहादत था । खुद शहीद होकर उन्होंने हजारों नवजवानों को देश पर मरने के लिए प्रेरित किया । राष्ट्र प्रेम भगत दे खून में ही था  । और उन्हें शहादत की प्रेरणा भी अपने घर से ही मिली थी ।

उनका पूरा परिवार ही क्रांतिकारी पृष्टभूमि का था । उनके दादा जी अर्जुन सिंह ,  पिता किशन सिंह , चाचा सरदार अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण  सिंह सभी आजादी के आंदोलन में सक्रिय रहे हैं । भगत के परिवार पर अंग्रेजी हुकूमत को हमेशा से शक था । भगत सिंह के एक चाचा सरदार स्वर्ण सिंह जेल में ही शहीद हो गए थे । और दूसरे चाचा अजीत सिंह  पुलिस से बचने के लिए देश से बाहर चले गए थे ।

एक बार लाहौर में बम विस्फोट हुआ । शक के कारण पुलिस ने भगत को जेल में डाल दिया । पर कोई सबूत न होने के कारण बस जुर्माना लेकर उन्हें छोड़ दिया गया था । 

बचपन से ही मिले देशभक्ति के प्रशिक्षण ने भगत को देश के लिए मरने और मारने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया । उनके पुरखों की शहादत और शौर्य का प्रताप उनके भी खून में था ।  जो उन्होंने 23 साल की उम्र में फाँसी पर लटकने से पहले एक बार भी नहीं सोचा । या ये कह सकते हैं कि देश की आजादी के लिए मरना ही उनका एक मात्र सपना था ।  देश के लिए मर मिटने का ऐसा जुनून ऐसी तालीम उन्हें विरासत में मिली थी ।

भगत चंद्रशेखर आज़ाद से भी वो बहुत प्रभावित थे । भगत उनसे एक बार मिलना चाहते थे । इसलिए वो हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन   से जुड़े । बाद में भगत ने अपने देश भक्ति और अपने जज्बे से सबका दिल जीत लिया । आजाद और उनमें गहरी दोस्ती हो गयी  ।  भगत ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन  नाम दिया ।

छोटी सी उम्र में उन्होंने ” इंकलाब जिंदाबाद ” और “साम्राज्यवाद का नाश हो ” जैसे  नारों को जन जन के मन मेंं पहुंचा दिया । और 23 मार्च 1931 में पार्लियामेंट में बम फेंकने के आरोप में वो हँसते हँसते फाँसी पर चढ़ गए । अपने वर्तमान को हमारे भविष्य के लिए निछावर कर दिया । भगत ने आत्म समर्पण करके फाँसी को चुना था । जो की उनके वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण है ।



वर्तमान में भगत सिंह की बस चार तस्वीरें उपलब्ध है।

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