हिंदू और हिंदुत्व धर्म या सियासी मोहरा

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हिंदू धर्म पर मचा सियासी घमासान

पिछले कुछ दिनों से देश की राजनीति में हिंदू और हिंदुत्व के मुद्दे से तापमान में कुछ गर्माहट है।कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की किताब ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ से शुरू हुआ यह मुद्दा राहुल गांधी और महबूबा मुफ्ती तक आ पहुंचा।

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दरअसल हिंदू और हिंदुत्व का यह मुद्दा सलमान खुर्शीद के किताब के उस पन्ने से शुरू होती है जिसमें सनातन संस्कृति और कट्टर हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम से की गई है। सलमान खुर्शीद के बचाव के लिए मोर्चा संभालते हुए महबूबा मुफ्ती ने कहां की सनातन धर्म हमें सांप्रदायिकता नहीं सिखाता बीजेपी और आरएसएस ने हिंदुत्व में हिंसा लाया है। अब राहुल गांधी के हिंदू और हिंदुत्व का अलग अर्थ बताने वाले बयान ने धर्म वाली राजनीति में आग में घी डालने वाला काम किया है। राहुल गांधी ने कहा कि अगर आप हिंदू हैं तो हिंदुत्व की क्या जरूरत है? जिसे बीजेपी ने हिंदुत्व पर सीधा प्रहार बताते हुए कांग्रेस को निशाने पर ले लिया है।

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हिंदुस्तान की सियासत में धर्म हमेशा से ही प्रमुखता से छाया रहा है, लेकिन जब बात चुनाव की हो तब यह किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए एक ज्वलंत मुद्दा बन जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हिंदू,हिंदुत्व या सनातन धर्म किसी की धार्मिक आस्था पर प्रहार नहीं या सिर्फ और सिर्फ यह वोट के लिए एक सियासी मोहरा। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और धर्म के नाम पर राजनीतिक पार्टियों का इस तरह घमासान एक सोच समझी रणनीति है या अपना वोट बैंक मजबूत करने का एक जरिया।

बात सिर्फ यूपी विधानसभा चुनाव की नहीं है बल्कि जब जब देश में चुनाव होने वाले होते हैं फिर चाहे वह विधानसभा के हो या लोकसभा के धर्म हमेशा ही एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। कभी अल्लाह के नाम पर तो कभी राम के नाम पर, मंदिर से लेकर मस्जिद तो कभी गौ से गंगा तक धर्म किसी ना किसी रूप में सियासत का धारदार हथियार बन ही जाता है।

हर चुनावी रैली में जय श्री राम के उद्घोष से लेकर चंडी पाठ तक हर जगह धर्म अपने स्थान पर कायम है। पूरे चुनावी मुद्दे में धर्म,गौ और नारी यह तीनों मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। भारत की राजनीति में भले ही शिक्षा,रोजगार और युवा नदारद रहें लेकिन धर्म पीछे नहीं छूटना चाहिए।बता दें की देश में धर्म के अलावा और भी ऐसे कई मुद्दे हैं जिस पर देश की जनता सरकार से ठोस कदम की उम्मीद रखती है।

खैर धर्म का ये खेल चुनाव परिणाम आने तक जारी रहेंगे। पक्ष और विपक्ष का घमासान भी ऐसे ही चलता रहेगा। फिलहाल देखना यह है कि हिंदू और हिंदुत्व का मुद्दा अभी और किस मोड़ पर जाता है।

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